मुंबई। महाराष्ट्र के राज्य आवासीय स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के 13 आवासीय स्कूलों में छात्राओं को छुट्टी के बाद हॉस्टल लौटने पर गर्भावस्था जांच यानी प्रेग्नेंसी टेस्ट से गुजरना पड़ रहा है। छात्राओं के लिए इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पढ़ाई और हॉस्टल में वापसी के लिए उन्हें इस तरह की जांच से क्यों गुजरना पड़ रहा है।
अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, छुट्टी के बाद हॉस्टल लौटने वाली छात्राओं को सरकारी अस्पताल ले जाकर उनकी जांच कराई जाती है। जांच के बाद अस्पताल की मुहर के साथ प्रेग्नेंसी निगेटिव लिखे मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट को छात्राओं को अपने सामान के साथ हॉस्टल में जमा करना पड़ता है।
छुट्टी से लौटते ही टेस्ट कराने के निर्देश
रिपोर्ट में छात्राओं के अनुभव भी सामने आए हैं। एक छात्रा ने बताया कि छुट्टी से लौटने के बाद एक छात्रा को पहले स्कूल जाने से पहले यह टेस्ट कराने के लिए कहा गया। छात्रा के मुताबिक इस वजह से उसे अपने पिता को भी साथ लाना पड़ा।
एक अन्य छात्रा ने बताया कि उसे दूसरी बार यह टेस्ट कराना पड़ रहा है। स्कूल में प्रवेश के समय भी उसका टेस्ट कराया गया था और अब छुट्टी से लौटने के बाद दोबारा जांच कराने को कहा गया।
छात्राओं के मुताबिक इस प्रक्रिया को लेकर उन्हें असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। कुछ छात्राओं ने बताया कि गांव में लोगों को जब इस तरह की जांच के बारे में पता चलता है तो वे सवाल करते हैं और हंसी-मजाक भी करते हैं।
‘बच्चे चिढ़ाते हैं, लोग हंसते हैं, पर क्या करें?’
रिपोर्ट में छात्राओं की परेशानी को सामने लाते हुए एक सवाल उठाया गया है कि छुट्टी से लौटने वाली छात्राओं को टेस्ट कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है। छात्राओं का कहना है कि उन्हें इस प्रक्रिया से असहजता होती है, लेकिन स्कूल और हॉस्टल में लौटने के लिए उन्हें इसका पालन करना पड़ता है।
एक छात्रा ने बताया कि ऐसी स्थिति में पिता को भी साथ लेकर आना पड़ता है। दूसरी ओर, गांव में इस जांच की जानकारी होने पर लोग तरह-तरह की बातें करते हैं।
हर सरकारी हॉस्टल में जांच कराने का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के हर सरकारी हॉस्टल में इस तरह की जांच कराए जाने की बात सामने आई है। इसके लिए छात्राओं को टेस्ट किट नहीं दी जाती, बल्कि अस्पताल में जाकर जांच करानी पड़ती है। रिपोर्ट में इसे आदिवासी बच्चियों का शोषण बताते हुए सवाल उठाए गए हैं।
अखबार में इस संबंध में भगवान मढे, एल्गार संगठन की ओर से भी आपत्ति दर्ज कराए जाने का उल्लेख है। उनका कहना है कि सरकारी हॉस्टलों में रहने वाली छात्राओं के साथ इस तरह की प्रक्रिया उनके सम्मान और अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है।
‘चरित्र’ साबित करने के लिए मेडिकल प्रमाणपत्र?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी छात्रा के हॉस्टल में वापस लौटने या स्कूल में प्रवेश के लिए उसकी निजी और संवेदनशील स्वास्थ्य जानकारी का इस तरह परीक्षण किया जाना उचित प्रक्रिया है।
छात्राओं की शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी निभाने वाले संस्थानों में ऐसी जांच को लेकर पारदर्शी नियम और स्पष्ट उद्देश्य होना जरूरी है। यदि किसी जांच की आवश्यकता है तो छात्राओं की निजता, गरिमा और सहमति से जुड़े कानूनी एवं प्रशासनिक पहलुओं को भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
मामले ने राज्य के आवासीय स्कूलों और छात्रावासों में छात्राओं के साथ अपनाई जा रही प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह भी महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग इस प्रक्रिया के उद्देश्य, आदेश और नियमों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करता है या नहीं।
नोट: खबर में आरोप/रिपोर्ट के रूप में दी गई बातों को तथ्य की तरह अंतिम रूप देने से पहले संबंधित सरकारी विभाग या आधिकारिक आदेश से पुष्टि करना बेहतर रहेगा।

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