हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पत्नी को घर के शौचालय का इस्तेमाल करने से रोकना और उसे गौशाला में रहने के लिए मजबूर करना सीधे तौर पर क्रूरता की श्रेणी में आता है। अदालत ने इस मामले में पति की ओर से लगाए गए क्रूरता और परित्याग के आरोपों को स्वीकार नहीं किया।
शिमला में हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस अजय मोहन गोयल और जस्टिस योगेश जसवाल की खंडपीठ ने मंडी फैमिली कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी गई थी। पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
मामले में याचिकाकर्ता पति पेशे से फिजिकल एजुकेशन टीचर है। उसने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अपनी पत्नी पर क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। पति का दावा था कि पत्नी पिछले 23 साल से उससे अलग रह रही है और उसने अपनी वैवाहिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारियां नहीं निभाईं। इसी आधार पर पति ने तलाक दिए जाने की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पत्नी के साथ किए गए व्यवहार का भी उल्लेख हुआ। कोर्ट ने पाया कि पत्नी को घर के शौचालय का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी गई और उसे गौशाला में रहने के लिए मजबूर किया गया। अदालत ने इस व्यवहार को सामान्य वैवाहिक मतभेद से अलग मानते हुए क्रूरता की श्रेणी में माना।
हाई कोर्ट ने पति की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि पत्नी अपनी मर्जी से लंबे समय से अलग रह रही थी। अदालत ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों से यह सामने आता है कि पत्नी स्वेच्छा से अलग नहीं रह रही थी, बल्कि पति के दुर्व्यवहार के कारण उसे ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अदालत ने मंडी फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की तलाक याचिका खारिज कर दी। इस फैसले में वैवाहिक संबंधों में सम्मानजनक व्यवहार और बुनियादी सुविधाओं के महत्व पर भी अदालत का रुख सामने आया है।

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